आध्यात्मिकता

शनि-पीड़ा को देते चीर, कष्टभंजन महावीर

Saturday, April 21, 2018 15:35 PM

 श्री राम भक्त हनुमान संकटमोचक और कष्टभंजक कहे जाते हैं। माना जाता है कि भूत-पिशाच हनुमान जी का केवल नाम उच्चारण करने मात्र से ही दूर भाग जाते हैं। यूं तो हनुमान जी के अनेक मंदिर प्रसिद्ध हैं तथा प्रत्येक मंदिर का अपना अनोखा इतिहास है। इसी क्रम में गुजरात के भावनगर के सारंगपुर में विराजे कष्टभंजन हनुमान जी का दर्शन करने प्रतिदिन हजारों लोग पहुंचते हैं।

 
यहां हनुमान जी को भक्तों ने सोने के सिंहासन पर विराजमान किया है। किले की तरह बने एक भवन के बीच विराजे कष्टभंजन देव हनुमान जी का यह दिव्य मंदिर अहमदाबाद से भावनगर की ओर जाते हुए लगभग 175 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। किसी राज दरबार की तरह सजे इस सुंदर मंदिर के विशाल और भव्य मंडप के बीच 45 किलो सोना और 15 किलो चांदी से बने एक सुंदर सिंहासन पर हनुमान विराजे हैं। उनके शीश पर हीरे जवाहरात का मुकुट है और निकट ही एक सोने की गदा भी रखी है। हनुमान जी के चारों ओर वानर सेना है और उनके पैरों में शनिदेव हैं। कष्टभंजन हनुमान जी के इस मंदिर में श्रीमूर्ति की दो बार आरती होती है। मंगलवार और शनिवार को यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। अधिकतर भक्त अपनी शनि पीड़ा, बुरी नजर के दोषों और अन्य कष्टों को दूर करने की कामना लेकर यहां आते हैं।
 
कष्टभंजन देव के पैरों में शनि की मूर्ति विराजमान है। यहां शनि बजरंग के चरणों में स्त्री रूप में दर्शन देते हैं। तभी तो भक्तों को विश्वास है कि शनि प्रकोपों से परेशान होने पर यहां नारियल चढ़ाने से समस्त चिंताओं से मुक्ति मिलती है। 
 
इसके पीछे कथा है कि लगभग 200 साल पहले भगवान स्वामी नारायण इस स्थान पर सत्संग कर रहे थे। बजरंग बली की भक्ति में वह इतने लीन हो गए कि उन्हें हनुमान के उस दिव्य रूप के दर्शन हुए जो इस मंदिर के निर्माण की वजह बना। बाद में स्वामी नारायण के भक्त गोपालानंद स्वामी ने यहां इस सुंदर प्रतिमा की स्थापना की। कहा जाता है कि एक समय था जब शनिदेव का पूरे राज्य पर आतंक था, लोग शनिदेव के अत्याचार से त्रस्त थे। आखिरकार भक्तों ने अपनी फरियाद हनुमान जी के दरबार में लगाई। भक्तों की बातें सुन कर हनुमान जी शनिदेव को मारने उनके पीछे पड़ गए। 
 
शनिदेव को जान बचाने का एक ही उपाय सूझा कि क्यों न स्त्री का रूप धर लिया जाए? हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं इसीलिए वह मुझे नारी रूप में देखकर मेरे प्राण नहीं लेंगे। ऐसा हुआ भी। पवनपुत्र ने शनिदेव को नहीं मारा लेकिन भक्तवत्सल भगवान राम ने उन्हें आदेश दिया, फिर हनुमान जी ने स्त्री स्वरूप शनिदेव को अपने पैरों तले कुचल दिया और भक्तों को शनिदेव के अत्याचार से मुक्त किया। मान्यता है कि बजरंग बली के इसी रूप ने शनि के प्रकोप से मुक्त किया इसीलिए यहां की गई पूजा से शनि के समस्त प्रकोप तत्काल ही दूर हो जाते हैं। मान्यता है कि यहां अगर कोई भक्त नारियल चढ़ाकर अपनी मनोकामना बोले तो उसकी कामना अवश्य पूरी होती है। साथ ही शनि पीड़ा से भी मुक्ति मिलती है।