किस्से और कहानी

आज भी श्रीलंका में हैं रामायण के ये राज, जानकर हो जाएंगे हैरान

Wednesday, May 23, 2018 17:45 PM

श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो से 180 किलोमीटर दूर एक हिल स्टेशन है, जहां कोलम्बो की गर्मी से ऊबे-घबराए युवा पनाह लेने पहुंचते हैं और चाय बागानों में खो जाते हैं। इस जगह को 1846 में एक अंग्रेज अधिकारी सैमुअल बेकर ने खोजा और यहां इंगलिश गांव बसा दिया। श्रीलंका पर शासन के दौरान अंग्रेजों का यही प्रिय हिल स्टेशन था। उससे पहले भी यह जगह कहीं गुम नहीं थी और वह इलाका गुम हो भी कैसे सकता है, जहां पुराणों की असंख्य गाथाएं दर्ज हों। जिन गाथाओं ने एक विशाल भूखंड की समूची संस्कृति को प्रभावित कर रखा हो, जिसने सभ्यता की गांठों में ही संस्कृति बांध दी हो। 

 
जहां पहाड़ों पर सीता जी के आंसुओं में डूबे कुछ झरने बचे थे, पानी का स्रोत बचा था जिसमें सीता जी की हथेलियों और जिव्हा की छुअन बची थी। वह पहाड़ अब भी खड़े थे, जहां हनुमान जी पहली बार श्रीलंका में उतरे थे, सीता जी की खोज में। वह अग्निकुंड अब भी किसी पहाड़ी पर अपनी आग बचाए हुए था।
 
नुवारा एलिया का इलाका ही सीता जी की खोज का गवाह है। समुद्र तल से लगभग 6200 फुट की ऊंचाई पर स्थित है दक्षिण भारतीय शैली में बना सीता अम्मन का मंदिर, जिसे सिंहली भाषा में सीता-एलिया कहते हैं। बताते हैं कि मंदिर की प्रतिमाएं पांच हजार साल पुरानी हैं। मंदिर में तमिल भाषा में राम-सीता और हनुमान जी की स्तुतियां बजती रहती हैं। 
 
हिंद महासागर में आंसू की एक बूंद की तरह दिखाई देने वाले इस देश की महत्ता का पता वहां पहुंचकर मिलता है। नुवारा एलिया के उस पहाड़ को जिसे आज भी अशोक वाटिका कहते हैं, उसके आस-पास का भूगोल अलग-सा है। आज भी अशोक के ऊंचे-ऊंचे पेड़ हैं वहां। पूरी पहाड़ी इन्हीं वृक्षों से ढंकी हुई है। पहाड़ी के सामने व्यस्त, पक्की पहाड़ी सड़क, उससे सटा हुआ सीता मंदिर और ठीक उसके पीछे बहता झरना, जाने कहां से आता है और कहां पहाड़ों में खो़ जाता है।
 
कहते हैं यह सदानीरा झरना है। सीता जी की यादों से जुड़ा है यह झरना। सीता हरण के बाद उन्हें यहीं रखा गया था। मान्यता है कि अशोक वाटिका में ग्यारह महीने के प्रवास के दौरान सीता जी इसी झरने के जलकुंड में नहाती थीं।
 
मंदिर के पीछे झरना और ऊंची पहाड़ी है। जलकुंड के पास चट्टानों पर पैरों के गहरे धंसे हुए निशान हैं। इन्हें हनुमानजी के पैरों के निशान बताते हैं। उन्हें लाल-पीले निशान से घेर दिया गया है। वहीं एक खंभे पर मूर्त है सीता जी की। अशोक वृक्ष के नीचे चबूतरे पर बैठी हुई सीता जी और उनके पैरों के पास हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठे हनुमान जी।
 
मंदिर और पहाड़ी के बीच पुल बना है, जिसके नीचे झरना बहता है अविरल। भारतीय पर्यटक पुल से गुजरते हुए माता सीता और हनुमान जी की मूर्त तक पहुंचते हैं। झरने का पानी चखते हैं, माथे से लगाते हैं और कुछ देर अपलक पैरों के निशानों को देखते हैं। फिर अशोक वाटिका की तरफ देखते हैं, जो अब सिर्फ जंगल है।
 
काल सबको नष्ट कर देता है, सिर्फ स्मृति बची रहती है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले बाहर कई बंदर उछलते-कूदते मिलते हैं। उनसे डरने की जरूरत नहीं होती, वह किसी को तंग नहीं करते। कुछ भी नहीं करते।
 
बंदरों को गौर से देखने पर पता लगता है की उनकी पूंछ काली है। शायद हनुमान जी अपनी प्रजाति यहां छोड़ गए होंगे। बंदरों की पूंछें यहां बहुत लंबी और काली हैं, मानो आग में झुलसी हुई हों।
 
वहां के स्थानीय लोगों का कहना है, ‘‘हनुमान जी ने लंका को जलाया था न, बैठे-बैठे पूंछ लंबी करके सब जला दिया था...। पूंछ में आग लगी थी, थोड़ी झुलस गई होगी। इसी से इधर के बंदरों की पूंछ काली...कहीं और ऐसे बंदर नहीं होते। रावण ने गंदा काम किया था, सीता जी को उठा लाया था, विभीषण अच्छा...हम लोग उसे पूजते हैं...!’’
 
अशोक वाटिका में त्रिजटा नाम की राक्षसी थी, जो सीता जी के साथ बहुत अच्छा सुलूक करती थी। ‘‘त्रिजटा नामक राक्षसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका।।’’
 
यही त्रिजटा थी जिसने विरह में व्याकुल सीता को ढांढस बंधाते हुए अपना सपना सुनाया था
 
सपने बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारि।।
 
त्रिजटा ने कहा कि मैंने सपना देखा है, एक वानर ने लंका जला दी है, राक्षसों की सारी सेना मार दी गई है।
 
यहां के पहाड़ी पर काली और सफेद मिट्टी दिखाई देती है। कहते हैं- लंका जलने के निशान हैं। कुछ निशानियां इसीलिए बची रह जाती हैं कि वे युगों तक आगाह करती रहें। 
 
सीता मंदिर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक इलाका है देवनारपोल। इसे अग्निपरीक्षा स्थल कहते हैं। शांत पहाड़ी पर स्थित इस परिसर को संरक्षित रखा गया है। काले प्राचीन कालीन पत्थरों से बने विशालकाय अग्निकुंड को घेर कर रखा गया है। गोल कुएं जैसी बनावट है और इसकी दीवारें ऊंची हैं।
 
इसके बाद आती है वह जगह जहां ऊंची पहाड़ी पर हनुमान मंदिर बना हुआ है। बताते हैं कि माता सीता जी की खोज में श्रीलंका गए हनुमान जी जिस पहाड़ी पर सबसे पहले उतरे और माता सीता खोज की योजना बनाई, वह पहाड़ी यही है। उस पहाड़ी पर विशालकाय पैरों के निशान मिले हैं। हनुमान जी ने तब समुद्र लांघने के लिए विशालकाय रूप धरा था।
 
श्रीलंका में यूं तो पांच प्रमुख जगहों की तलाश की गई, जहां-जहां रामायण कालीन निशान मौजूद हैं। लेकिन सबसे ज्यादा श्रद्धालु जिन जगहों को देखने आते हैं उनमें सीता अम्मा मंदिर और अग्नि परीक्षा स्थल हैं। सीता हरण से ज्यादा सीता की अग्नि परीक्षा का संगीन मामला है। इसकी लपटें सदियों तक उठती रहेंगी।