आध्यात्मिकता

‘मानव देह का अंत निश्चित है’

Monday, May 07, 2018 16:25 PM

हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित वनवास अवधि के दौरान राम, लक्ष्मण तथा सीता अनेक ऋषि-मुनियों से मिले। उस अवधि में राम तथा तपस्वियों के मध्य विभिन्न विषयों पर जो वार्तालाप हुआ वह जीवन-दर्शन का श्रेष्ठ पैमाना है। इसी क्रम में राम ऋषि शरभंग के आश्रम पहुंचे। शरभंग की मानव देह का अंत निश्चित था। उन्होंने अपनी योग व आध्यात्मिक शक्तियों से इतनी ऊर्जा अर्जित कर ली कि उनके अंत समय स्वयं भगवान इंद्र उन्हें सदेह स्वर्ग ले जाने पृथ्वी पर आए परंतु उन्होंने इंद्र का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

 
इस अस्वीकृति पर प्रश्राकुल इंद्र को शरभंग का उत्तर मिला, भगवन, मानव देह तो पंच तत्वों का मिश्रण है। मैं भी स्वयं मानव देह ही हूं। अपने अंत समय में सदेह पृथ्वी लोक छोडऩा प्राकृतिक नियम के विरुद्ध होगा। मैं आत्मस्वरूप होकर ही भू-लोक त्यागूंगा परंतु अभी मुझे श्री राम की प्रतीक्षा है। उनके दर्शन किए बिना मैं प्राण नहीं छोड़ूंगा।
 
शरभंग मुनि की इच्छा से अवगत होकर इंद्र वापस चले गए। वहीं दूसरी ओर कुछ दूरी पर वृक्षों के झुरमुट की आड़ में खड़े राम जी ने शरभंग तथा इंद्र के बीच हुई सारी बातचीत सुन ली। जब शरभंग और राम जी मिले तो उन दोनों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।
 
शरभंग बोले, हे राम, तुम तो मानव रूप में ईश्वरीय अवतार हो। मैं अंतर्ध्यान होने से पूर्व तुम्हारे ही दर्शन को व्याकुल था। मुनि के तपोबल से आश्चर्यचकित होकर भगवान राम बोले, मुनिवर, आपसे श्रेष्ठ कौन हो सकता है। आप तो अमरता तथा सदेह स्वर्ग जाने का अवसर छोड़ प्रकृति नियमों के प्रति दायित्व निभा रहे हैं। आपके सम्मुख तो साक्षात ईश्वर भी नतमस्तक होंगे। जो भी साधारण मानव आपके गुणों को ग्रहण करेगा, वह साधारण होकर भी देवताओं के लिए पूजनीय व आदरणीय होगा।